मैहर शारदे माता मंदिर के रहस्य:

मैहर मध्य प्रदेश के अंदर ही आता है, जहा शारदा माता का एक विश्वप्रसिद्ध और चमत्कारी मंदिर है शारदा माता के मंदिर को को इस जगह के नाम पर मैहर देवी के नाम से भी जाना जाता है, कहने को तो यह मंदिर मध्य प्रदेश में है लेकिन इस मंदिर की प्रसिद्धि यहाँ से ज्यादा पडोसी राज्य उत्तर प्रदेश में देखने को मिलती है तमसा नदी के तट पर त्रिकूट पर्वत पर 600 फुट की उचाई पर स्थित   मैहर पर्वत का उल्लेख प्राचीन धर्म ग्रन्थ महेंद्र में मिलता है इसके अलावा भारत के अन्य पर्वतो के साथ पुराणों में भी इसका जिक्र किया गया है। 

मैहर का शाब्दिक अर्थ है माँ का हार यह आपके लिए बहुत महत्वपूर्ण जानकारी है, माना जाता है भगवान भोलेनाथ के तांडव के दौरान उनके कंधे पर रखे माता पार्वती के सव से गले का हार त्रिकूट पर्वत पर आके गिरा था इसलिए मैहर का यह मंदिर मइया के हार के लिए विश्वप्रसिद्ध है जहा लोग दूर दूर से अपनी मुरादे लेकर आते है, माता का यह मंदिर 108 शक्ति पीठो में से एक है।

मैहर जाने के लिए सुविधा:

 मैहर जाने के लिए आप बस या ट्रेन किसी से भी पहुंच सकते है यहाँ से सतना जिला ज्यादा दूर नहीं लेकिन मैहर तक ट्रेन सुविधाएं प्रदान की गई है जिससे आप आराम से मैहर देवी के दरसन कर सकते है मैहर पर्वत में स्थित है इसलिए बुजुर्गो और बहुत से अपाहिज लोगो के लिए अलग से सुविधाएं प्रदान की गई है जिससे उन्हें ऊपर मंदिर तक पहुंचाया जा सके। 

स्थानीय रहस्य:

इसके अलावा यहाँ के गांव वाले अथवा स्थानीय लोगो के बीच प्रचलित कहानियो के आधार पर यह कहा जाता है मैहर का नाम केवल मैया शारदे माता मंदिर से ही प्रचलन में आया यहाँ के श्रद्धालु माता को माई अथवा मइया कह कर संबोधित करते है मैहर को पहले माई घर अथवा बाद में मइया का घर बुलाते थे लेकिन कुछ समय बाद इसे मैहर के नाम से जाना जाने लगा। 

आल्हा और उदल के रहस्य: 

कहा जाता है आल्हा और उदल नामक दो भाइयो ने सबसे पहले जंगलो के बीच शारदा देवी के इस मंदिर की खोज की थी,कहा जाता है मंदिर की तलाश आल्हा और उदल ने की थी इसके बाद आल्हा ने मैहर माता मंदिर में  लगभग 12 वर्षो तक तपस्या कर देवी को प्रसन्न किया था प्रसन्न होकर माँ ने उन्हें अमृत का वरदान दिया था आल्हा माता को शारदे माई कहकर पुकारा करते थे तभी से यह मंदिर भी शारदे माता के नाम से प्रसिद्द हो गया। आल्हा और उदल दोनों परमवीर भाई थे। उन्होंने कई युद्ध लड़े उन्होंने आखिरी लड़ाई पृथ्वी राज चौहान से लड़ी थी माँ शारदे के आशीर्वाद के कारण आल्हा के मृत्यु नहीं हो सकती थी। इसलिए पृथ्वी राज चौहान की सेना को पीछे हटना पड़ा, पृथ्वीराज चौहान को हराने के बाद आल्हा के मन में वैराग्य आ गया उन्होंने संन्यास ले लिया कहते है।

 अन्य रहस्य: 

पहाड़ो के नीचे एक बड़ा सा तालाब है। जिसे आल्हा के तालाब के नाम से  संबोदित किया जाता है, तालाब से 3 किलोमीटर आगे जाने पर एक बहुत बड़ा अखाड़ा मिलता है जिसके बारे में कहा जाता है की यहाँ आल्हा और उदल दोनों भाई कुस्ती का अभ्यास किया करते थे। यहाँ एक भव्य मंदिर भी है, जिसमे आल्हा की विशाल प्रतिमा स्थापित की गई है और आल्हा की वह तलवार इस प्रतिमा के हाथ में थमाई गई है, माता का यह धाम बहुत चमत्कारो से प्रसिद्द है कहा जाता है की आज भी शारदे माता के सबसे पहले दरसन आल्हा और उदल ही करते है। 

आल्हा और ऊदल रात्रि में आकर करते है पूजा:

 कहा जाता है इतने वर्षो बाद भी आल्हा और ऊदल माता के पास आते है, रात्रि 2 से 5 बजे के बीच आल्हा और ऊदल मंदिर में सबसे पहले आकर माता के दरसन करते है और माता रानी का पूरा श्रृंगार करते है इसके साथ ही सुबह की आरती भी आल्हा और ऊदल ही करते है। लोग बताते है जब ब्रम्हमुहृत में शारदा मंदिर के पट खोले जाते है तो पूजा पहले से की हुई मिलती है और फूल भी चढ़े मिलते है इसी के साथ यहाँ बहुत सारे रहस्य छुपे है। लोग कहते है शाम की आरती होने के बाद भी जब पुजारी पट बंद करके चले आते है तब भी अंदर से घंटी और पूजा होने की आवाज आती रहती है लोगो का मानना है  मंदिर में कई दैविक शक्तियाँ है जो यहाँ आकर माता की पूजा करती है माँ शारदा देवी के प्रतिमा के ठीक नीचे न पढ़े जा सकने वाले ग्रथ लिखे हुए है जो आज तक पढ़े अथवा किसी के समझ में नहीं आ सके यह एक रहस्स बने हुए है। कहाा  जाता है  प्राचीन काल में यहाँ माता को प्रसन्न करने के लिए पशुओ की बली दी जाती थी। लेकिन सन 1922 में जैन दर्शनाथियों की प्रेरणा से तत्कालीन महाराजा ब्रजनाथ सिंह जूदेव ने शारदा मंदिर परिसर में जीव बली को प्रतिबंदित कर दिया क्योकि हर धर्म के लोग माता के दरसन के लिए आ सके।   

नवरात्री का मेला लगता है:

वैसे तो इस मंदिर में हमेशा ही भक्तो की भीड़ लगी रहती है, लेकिन प्रतिवर्ष नवरात्रि में यह मेला लगता है। जिसमे लाखो श्रद्धालु यहाँ माता के दरसन के लिए आते है। इस मंदिर से जुड़ी एक मान्यता और भी है की यह रात्रि में रुकना मना है अगर कोई भी व्यक्ति रात में रुकता भी है तो वह अगली सुबह नहीं देख पाता। मैहर देवी मंदिर के यह रहस्य आम लोगो के अलावा वैज्ञानिकों को भी आकर्षित करते है इसलिए इन रहस्यों को सुलझाने के लिए भी वैज्ञानिको की टीम भी यह आ चुकी है लेकिन तब  रहस्य जस के तस बरकरार है और यह अभी तक यैसे ही चलता आ रहा है मैहर माता मंदिर का इतिहास कुछ इस तरह है। 

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