रेलगाड़ी का इतिहास Satna News Media

रेल का इतिहास:

यह दौर था 18 वीं सदी की शुरुआत का जब दुनिया बहुत तेजी से बदल रही थी। लोगों के विचार बदल रहे थे। जिंदगी जीने के मायने भी बदल रहे थे। अब कोई सिर्फ खाने पीने तक सीमित नहीं रहनाचाहता था। लोग अपनी जिंदगी को आसान बनाना चाहते थे और यह यूरोप में औद्योगिक तथा इसी दौर में यानी सत्र 1712 में थॉमस निकोमन एक इंजन का आविष्कार किया जो कि बहुत ही सफल नहीं रहा।

 फिर 1726 में जन्मे जेम्स वाट ने 1776 में निकोमन की थ्योरी पर काम करते हुए स्टीम इंजन का आविष्कार किया जो कि हमारी दुनिया के लिए एक बहुत बड़ा। बदलाव साबित हुआ। इस भाप इंजन के आविष्कार के बाद ही वैज्ञानिकों की सोच में बिना घोड़ों से चलने वाली गाड़ी बनाने का ख्याल आया। 18 वीं सदी की शुरुआत में दुनिया में कई ऐसे इंजीनियर थे जो कि चाहते थे, किसी ऐसी गाड़ी को बनाया जाए जिसे बिना घोड़ा गाड़ी के चलाया जा सके। इस दौर तक गाड़ियों को सिर्फ जानवरों द्वारा ही चलाया जाता था।और फिर कई लोगो ने इस पर काम भी किया पर कुछ खास सफलता हाथ नहीं लगी। ट्रेन का अविष्कार भी इतिहास में काफी लंबा रहा है और अलग-अलग समय में कई लोगों ने अपना योगदान दिया है। आमतौर पर जिन लोगों का नाम ट्रेन का आविष्कार में गिना जाता है, वह है रिचर्ड ट्रेविथिक, मैथ्यू मरे, जॉर्ज स्टीफेंसन थे।  इन लोगों ने भी जेम्स वाट के इंजन के आविष्कार के बाद ही रेलगाड़ी बनाने का सोचा था। 

पहला प्रयास:

पहली बार 1769 में फ्रांसीसी सेना के एक इंजीनियर निकोलस ने भाप से चलने वाली है। गाड़ी बनाई जो कि दुनिया की पहली बिना जानवरों की चलने वाली गाड़ी थी। यह किस्म की दो गाड़ी थी जो चलते समय बहुत शोर करती थी और इस पर बहुत सारी चिंगारियां भी निकलती थी। साथ ही उसका वजन बहुत ज्यादा था और यह घोड़ा गाड़ी से ज्यादा खर्चीली भी थी। कुछ दिन के बाद इसकी चक्के भी टूट गए और यह बहुत उपयोग ही नहीं थी। इसलिए इसको शस्त्रागार में डाल दिया गया था। 

दूसरा प्रयास:

(Richard Trevithick) जिन्हें रेलगाड़ी का जन्मदाता कहा जाता है। उस समय एक युवा मैकेनिकल इंजीनियर थे। उन्होंने काफी प्रयासों के बाद आखिर सन 1801 में लोहे के एक बड़े भाप इंजन वाली गाड़ी बनाने में सफलता हासिल कर ली। इनकी गाड़ी में धुएं के लिए एक बड़ी चिमनी और साथ ही कुछ पैसेंजर उसके बैठने के लिए जगह बनी हुई थी। इनकी यह गाड़ी जमीन और रेल दोनों पर चलने के लिए बनाई गई थी। यह गाड़ी जब भी चलती थी तो शोर काफी करती थी और हिलती थी। जब यह पहली बार पटरी पर चली तो उसे देखकर लोग डर गए थे। बाद में इनकी गाड़ी में कोयले की वजह से आग लग गई थी पर Richard Trevithick एक बहुत ही साहसी और प्रभावशाली व्यक्ति थे।

 उनकी पहली गाड़ी में आग लगने के बाद उन्होंने हिम्मत नहीं आ रही। और फिर 1803 में उन्होंने दूसरी बार भाप से चलने वाली इंजन गाड़ी बनाई जिसे उन्होंने दूसरी बार भाप से चलने वाली इंजन गाड़ी बनाई जिसे उन्होंने लंदन तक की सड़कों पर चलाया। इस सफर में गाड़ी के इंजन को बुरी तरह से नुकसान हुआ। Richard Trevithick ने गाड़ी को लंबे समय तक प्रयोग में लाने के लिए पटरी पर ही चलाने का सोचा जिस वजह से उन्होंने एक कंपनी से हाथ मिलाया और  लंदन तक पढ़ लिया बिछा दी और 21 फरवरी 1804 को एक ट्रेन जिसमें 25 टन लोहा और 70 आदमी सवार थे। उसे Richard Trevithick ने 4 घंटे और 5 मिनट तक चलाया था कि दुनिया में पहला मौका था जब भाप के इंजन से इतना भारी और ज्यादा सामान खींचा गया था। पर इस समय तक रेलगाड़ी को बहुत ही खर्चीला और कम उपयोगी माना जाता था। इसलिए उस समय किसी कंपनी ने प्रोजेक्ट पर काम करना फायदेमंद नहीं समझा। इसलिए Richard Trevithick ने इस प्रोजेक्ट पर काम करना बंद कर दिया था। 

तीसरा प्रयास:

 (Matthew Murray) एक नई सोच के इंजीनियर और व्यापारी थे जो हमेशा से एक ऐसा वाहन बनाना चाहते थे जो घोड़ो पर निर्भर न होकर भाप के इंजन से चले। उन्होंने 1812 में Richard Trevithick के द्वारा बनाई गई रेलगाड़ी में काफी बदलाव किया। इसके भाप इंजन को नए तरीके से मॉडिफाई किया गया और फिर सन 1812 में व्यापारिक रूप से चलाने के लिए इसे पहली बार पटरी पर दौड़ाया गया। इससे पहले Richard Trevithick ने सिर्फ एक बार ही ट्रेन को पटरी पर चलाया था और Matthew Murray ने पहली बार ऐसे ही व्यापार करने के लिए चलाया था। उनकी कंपनी ने इंग्लैंड के कई शहरों में धीरे-धीरे रेल की पटरियां बिछाने का काम शुरू किया और अभी तक रेलवे इतनी ज्यादा प्रचलित नहीं हुई थी कि ऐसे लोगों द्वारा खुलकर अपनाया जाता। अभी तक रेलवे द्वारा ज्यादातर माल ढोने का काम ही किया जा रहा था। 

चौथा प्रयास:

George Stephenson & company  जो उनके बेटे रॉबर्ट के नाम थी। इन्होंने भाप के इंजन में कई बदलाव करके उसे और ज्यादा मजबूत और शक्तिशाली बनाया था जो भारी वजन को खींचने में सक्षम भी था। 27 सितंबर 1825 को भाप के इंजन से 38 डिब्बों वाली रेलगाड़ी को खींचा गया, जिसमें 600 यात्री सवार थे। इस पहली रेलगाड़ी ने लंदन से स्टॉकलैंड तक का 37 मील का सफर 14 मील प्रति घंटा की रफ्तार से तय किया था। आधिकारिक रूप से ऐसे ही विश्व की पहली ट्रेन कहा जाता है जिसने पैसेंजर को एक स्थान से दूसरे स्थान तक सफर कराया था। दुनिया की पहली ट्रेन के भाप के इंजन का नंबर था। लोकोमोशन नंबर वन George Stephenson ने ट्रेन के आविष्कार में क्रांति ला दी थी। इनके कोयले के इंजन के इस्तेमाल के बाद दुनिया के अन्य देशों में से बनाने की होड़ लग गई थी। हॉलीवुड oliyver evance एक अमेरिकी इंजीनियर थे। इन्होंने भाप के इंजन में कई बदलाव किए और पहली बार हाई प्रेशर भाप के इंजन का निर्माण किया। 

पांचवा प्रयास:

( rudolf karl diesel) रुडोल्फ डीजल 758 में जन्मी रुडोल्फ डीजल ने 1897 में डीजल इंजन बनाकर कीर्तिमान रच दिया था। उनके बनाए हुए इंजन का प्रयोग आज भी पूरी दुनिया में किया जाता है। उन्होंने 1897 में 25 हॉर्स पावर के चार स्ट्रोक सिंगल सिलेंडर डीजल इंजन बनाया था। इनके अविष्कार के बाद 1912 में रोमन सोल्ड ने रेलवे द्वारा स्विट्जरलैंड में पहली बार डीजल इंजन से रेलगाड़ी चलाई गई थी।

 भारतीय रेल का इतिहास:

 आज भारतीय रेल को दुनिया की टॉप 5 सबसे बड़ी रेलवे नेटवर्क में गिना जाता है जो कि तकरीबन 15 लाख कर्मचारियों को रोजगार देती है और पूरे देश को आपस में जोड़ कर रखती है। पर क्या आप जानते हैं कि भारत में पहली रेलगाड़ी कहां चली थी। अगर नहीं तो मैं आपको बता दूं कि भारत में पहली रेलगाड़ी 16 अप्रैल 1853 को बोरीबंदर से थाने तक 35 किलोमीटर तक चलाई गई थी। उस वक्त ट्रेन तकरीबन 20 दिनों की थी और इसमें 400 यात्रियों ने सफर किया था। इस रेलगाड़ी को ब्रिटेन से मंगाए गए तीन भाप के इंजन सुल्तान, साहेब, सिंधु ने खींचा था। 

आपको बता दें कि 1845 में कोलकाता में ग्रेट इंडियन पेनिनसुला रेल कंपनी की स्थापना हुई। इसी कंपनी ने 1850 में मुंबई से थाने तक रेल की पटरियां बिछाने का काम शुरू किया था। भारत में 1856 से भाप के इंजन बनना शुरू हुए थे और धीरे-धीरे पूरे देश में पटरी बिछाने का काम भी शुरू हुआ। हालांकि पूरे देश में पटिया बिछाना कोई आसान काम नहीं था। इसे बहुत सी जगह रोकने के लिए आंदोलन भी किया गया पर ब्रिटिश सरकार की क्रूरता के आगे किसी की नहीं चलती थी। 


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