80 के हुए शहंशाह, इस उम्र में भी हिम्मत होसले से सतत कर्म को लेकर नई पीढ़ी के आदर्श-नायक

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अमिताभ बच्चन आज भी जहां खड़े होते हैं, लाइन वहीं से शुरू होती है….

अपने दोस्त टीनू आनंद की फिल्म ‘कालिया’ में ‘हम जहां खड़े हो जाते हैं, लाइन वहीं से शुरू होती है’ बोलकर खूब तालियां बटोरी थीं। तब शायद उन्होंने भी नहीं सोचा होगा कि यह फिल्मी संवाद अभिनेता के रूप में उनका प्रतिनिधि-वाक्य बन जाएगा। आज उम्र के 80 साल पूरे करने के बाद भी मनोरंजन की दुनिया में वह जहां खड़े होते हैं, लाइन वहीं से शुरू होने लगती है। यह करिश्मा भारतीय सिनेमा में किसी और अभिनेता को नसीब नहीं हुआ। न भूतो न भविष्यति । अभिनय के बादशाह दिलीप कुमार 70 साल की उम्र में फिल्मों से दूर हो गए थे। वह तो फिर भी अमिताभ से काफी पहले की पीढ़ी के थे। अमिताभ के समकालीन और बाद के ज्यादातर अभिनेता रिटा हो चुके है।

हालात से जूझना और बाजी पलटना

इस उम्र में अमिताभ की सक्रियता इसलिए भी उल्लेखनीय है कि वह 32 साल से मियासथीनिया ग्रेविस से जूझ रहे हैं। इस बीमारी में मांसपेशियां कमजोर होती जाती हैं। हेपेटाइटिस बी ने भी उन्हें गिरफ्त में ले रखा है। खुद अमिताभ ने सोशल मीडिया पोस्ट में बताया था कि उनका लिवर 75 फीसदी खराब हो चुका है। फिर भी उनका हालात से जूझने और बाजी को अपने पक्ष में करने का जज्बा बरकरार है। इसी जज्बे के दम पर वह हारी हुईं कई बाजियां पलट चुके हैं।

उत्तर भारतीयों को दी पुख्ता इमेज

कई दूसरे पहलुओं की तरह अमिताभ बच्चन का यह योगदान भी महत्त्वपूर्ण है कि उन्होंने हिन्दी सिनेमा में उत्तर भारतीयों को नई और पुख्ता इमेज दी। वह चाहे जिस किरदार में नजर आएं, उनकी अदाकारी में अवधी और भोजपुरी की मिली-जुली संस्कृति तथा हाव-भाव का असर खुद-ब-खुद छलक पड़ता है।

‘शराबी को शराबी नहीं तो क्या पुजारी कहोगे और गेहूं को गेहूं नहीं को क्या ज्वारी कहोगे ‘ (शराबी) जैसे आम संवाद भी उनकी अदायगी से खास हो जाते हैं। निर्देशक रवि टंडन ने ‘मजबूर’ (1974) की शूटिंग के दौरान ही कह दिया था कि अमिताभ के व्यक्तित्व में जो इलाहाबादी रंग-ढंग हैं, एक दिन वही उनकी सबसे बड़ी ताकत होंगे।

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